सामरिक चुनौतियों का बढ़ता दायरा

09_01_2017-8udaybhaskarकश्मीर के सोपोर में तीन जनवरी को भारतीय सुरक्षा बलों ने पाकिस्तानी आतंकियों के नापाक मंसूबों को नाकाम कर दिया। इसी तरह जब दुनिया नए साल का जश्न मना रही थी तब इस्तांबुल और बगदाद दुखद आत्मघाती बम हमलों से दहल उठा। ये घटनाएं 2017 में भारत और इसके आसपास के देशों के समक्ष आने वाली सुरक्षा चुनौतियों का संकेत दे रही हैं। 2017 में आइएस, अलकायदा और लश्कर-ए-तैयबा आदि संगठनों के जिहादी आतंकवाद के पूरे विश्व में अलग-अलग तरीकों से बढ़ने की संभावना है। हालांकि पाकिस्तान और चीन के विपरीत रुख के कारण इस संबंध में भारत के अनुभव कटु रहे हैं। उल्लेखनीय है कि गत वर्ष 2016 की शुरुआत जनवरी में पठानकोट हमले से हुई थी और समाप्ति नवंबर में नगरोटा हमले के साथ हुई। सेना के कैंपों पर हुए इन हमलों के दौरान हमने स्पष्ट रूप से देखा कि कैसे आतंकी तत्व सेना का सुरक्षा घेरा तोड़ने और जवानों को हताहत करने में सफल रहे थे। पूर्व उपसेना प्रमुख लेफ्टिनेट जनरल फिलिप कैम्पोस ने सैन्य प्रतिष्ठानों और सीमा की सुरक्षा नीति की समीक्षा की है और यह उम्मीद की जा रही है कि 2017 में इसे तेजी से लागू किया जाएगा, ताकि 2016 जैसी आतंकी घटनाएं दोहराई न जा सकें। लेकिन प्रश्न है कि क्या भारतीय सेना का शीर्ष प्रबंधन इन विशिष्ट और लंबित सुझावों को लागू करने में सक्षम है। पूर्व के अनुभव बताते हैं कि निर्णयों को लागू करने वाली उसकी मौजूदा संरचनाएं ऐसे किसी भी बदलाव की अनुमति नहीं देती हैं, जिससे कि उसकी अक्षमताओं को दूर किया जा सके। मोदी सरकार केंद्र में अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है। उसने रक्षा प्रबंधन के शीर्ष स्तर पर संरचनात्मक बदलाव को अपने मुख्य एजेंडे में शामिल किया है, लेकिन प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री के बार-बार कहने के बावजूद भी इसमें कोई परिवर्तन नहीं आ रहा है। हमें ध्यान रखना होगा कि भारत की सुरक्षा चुनौतियां सिर्फ आतंकवाद और निम्न तीव्रता के संघर्ष तक ही सीमित नहीं है। इसका दायरा काफी विस्तृत है। भारत के सामने परमाणु हथियारों और मिसाइलों सहित समुद्री, साइबर और अंतरिक्ष हमलों का भी खतरा है। इसके अलावा आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर भी खासी चुनौतियां मौजूद हैं। यह तथ्य है कि सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की क्षमता किसी देश की सेना की क्षमता और संस्थागत संकल्प और एकता पर निर्भर करती है। साथ ही यह उस देश की शासन संरचना और संस्थागत क्षमता से जुड़ी होती है। हालांकि मौजूदा चुनौतियां सुनिश्चित करती हैं कि भारत अपनी सैन्य जरूरतों को स्वयं पूरा करने में सक्षम है, जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने मेक इन इंडिया का नाम दिया है।

इसके अलावा 2016 में सामने आए कुछ अन्य तथ्य भारतीय राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र में वर्तमान खामियों को बेहतर ढंग से हमारे सामने रखते हैं। गौरतलब है कि 2016 में आतंकी हमलों के दौरान देश में उग्र विमर्श और प्रतिक्रिया देखी गई, जबकि इसकी कोई जरूरत नहीं थी। हालांकि इसको बढ़ाने में 24 घंटे चलने वाले समाचार चैनलों का भी हाथ था। इसके अलावा रक्षा और गृह मंत्रालय के बीच जिम्मेदारियों को लेकर मतभेद भी खुलकर सामने आए। इसका किसी भी सूरत में समर्थन नहीं किया जा सकता है। भारत पिछले 25 वर्षों से आतंकवाद की चुनौतियों का सामना कर रहा है। दुर्भाग्य की बात है इसके बावजूद भी ये मतभेद बरकरार हैं। इसके अतिरिक्त कुछ आतंकवाद विरोधी ऑपरेशनों में सेना प्रमुख और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भागीदारी की बात समझ में नहीं आई। यह दुखद है कि भारत वर्षों से पाकिस्तान समर्थित छद्म आतंकवाद का सामना कर रहा है और इसने अब तक इसका जवाब देने के लिए कोई संस्थागत ढांचा खड़ा नहीं किया है, जबकि अब तक इसे आकार ले लेना चाहिए था। आंतरिक सुरक्षा के संदर्भ में भारत के सामने एक जटिल चुनौती आतंकवाद रोधी अपनी रणनीति की समीक्षा से भी जुड़ी है। भारत को तय करना होगा कि क्या उसकी रणनीति जरूरत से अधिक रक्षात्मक हो गई और क्या 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद उसकी नीति वास्तव में बदल गई है और क्या यह लाभकारी और टिकाऊ होगा?
भारत की एक राष्ट्रीय चुनौती आयातित रक्षा उपकरणों पर भारतीय सेना की निर्भरता से संबंधित है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार सैन्य हथियारों और उपकरणों के दुनिया के सबसे बड़े आयातकों की सूची में भारत सऊदी अरब के बाद दूसरे स्थान पर है। घरेलू रक्षा और आयुध उत्पादन पर सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों और आयुध फैक्ट्रियों का प्रभुत्व है। इस व्यवस्था को बदलने के लिए पिछले कई दशकों से अनेक प्रस्ताव किए जाते रहे हैं, लेकिन हालात अभी नहीं बदले हैं। यहां तक कि 2014 में सत्ता में आने के बाद से ही प्रधानमंत्री मोदी मेक इन इंडिया को प्राथमिकता देने का आह्वान करते रहे हैं।
यह तथ्य है कि गत एक दशक में सात लाख करोड़ रुपये से अधिक रक्षा संबंधी जरूरतों पर खर्च हुए हैं। इसके साथ ही भारत के पास रक्षा उत्पादन से जुड़े पेशेवरों और विशेषज्ञों की बड़ी टीम है। ये मिलकर भारत में मैन्युफैक्चरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट को गति प्रदान कर सकते हैं औैर इस तरह मेक इन इंडिया को जरूरी साधन मुहैया करा सकते हैं ताकि अधिकांश सैन्य जरूरतें घरेलू उत्पादन से ही पूरी की जा सकें। बहरहाल पिछले दो वर्षों के दौरान रक्षा खरीद प्रक्रिया निराशाजनक रही है। घपले-घोटालों से दबी और अस्पष्टता के आवरण में लिपटे रक्षा सौदों की प्रक्रिया को अभी मोदी सरकार द्वारा अंतिम रूप दिया जाना बाकी है। माना जा रहा है कि इससे सैन्य खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी, प्रमुख सैन्य आपूर्तिकर्ता देशों और भारतीय संस्थाओं के बीच सामरिक संबंध मजबूत होंगे और मेक इन इंडिया को बढ़ावा मिलेगा। दुर्भाग्य की बात है कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा क्षमता में कई गंभीर खामियों और कमियों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जाता रहा है।

इसमें से कई तो दशकों से मौजूद हैं। इनमें से कुछ को पहचानने और उन्हें अपने एजेंडे में ऊपर रखने के लिए मोदी सरकार की प्रशंसा की जानी चाहिए। लेकिन चिंता की बात यह है कि सुरक्षा चुनौतियां विशाल हैं और सामरिक मोर्चे पर अनिश्चितता के बादल नजर आ रहे हैं। चीन की दोहरी सोच ने इसे और बढ़ा दिया है। आशंका है कि 20 जनवरी को डोनाल्ड ट्रंप द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति की कुर्सी संभालने के बाद सामरिक मोर्चे पर 2017 में अनिश्चितता और बढ़ जाएगी। माना जा रहा है कि अमेरिका एशिया में अपनी सुरक्षा नीतियां की समीक्षा कर सकता है और उनमें नए सिरे से बदलाव कर सकता है। इसका भारत की सुरक्षा व्यवस्था पर खासा असर होगा। कुल मिलाकर सामरिक चुनौतियों से लेकर सीमापार आतंकवाद के खतरों तक साल 2017 ढेरों दुखद अप्रत्याशित घटनाओं का गवाह बन सकता है। लिहाजा भारत को अपनी खामियों और मजबूरियों को तेजी से दूर करने के लिए संस्थागत निपुणता हासिल करने की जरूरत है। इसके लिए सुरक्षा नीति से जुड़े लोगों को बिना किसी देरी के जुट जाना चाहिए। तभी वे खतरे दूर होंगे जो आंतरिक सुरक्षा के समक्ष उभर आए हैं।

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